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Wednesday, May 27, 2020

ग्वालियर के दिग्गजों की भोपाल दौड़, जयभान के बाद अनूप मिश्रा पहुंचे BJP मुख्यालय, कैसे मनाएगी BJP

ग्वालियर. उपचुनाव की रणनीति को लेकर बीजेपी (BJP) अपने उन दिग्गज नेताओं को साधने में लगी है जिनके चुनाव के दौरान नाराज हो जाने की संभावनाएं हैं. इसी कड़ी में ग्वालियर चंबल संभाग के दिग्गज बीजेपी नेता एक-एक कर भोपाल पहुंच रहे हैं. पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया के बाद अब पूर्व मंत्री और स्व. अटल बिहारी वाजपेई के भांजे अनूप मिश्रा ने भोपाल पहुंचकर प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा से मुलाकात की है. अनूप मिश्रा (Anoop Mishra) सोमवार को बीजेपी प्रदेश कार्यालय पहुंचे और यहां पर उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात की. हालांकि मुलाकात बंद कमरे में हुई लेकिन यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अनूप मिश्रा के साथ पार्टी ने संभावित चुनाव की रणनीति को लेकर चर्चा की है. साथ ही उनकी नाराजगी को भी दूर करने की चर्चाएं चल रही हैं.रअसल कांग्रेस से बीजेपी में आए नेताओं के चुनाव लड़ने की संभावनाओं के बाद अब यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिरकार जो नेता पहले से बीजेपी के हैं और चुनाव लड़ने की कतार में हैं उन्हें पार्टी कैसे मनाएगी ?
अनूप मिश्रा और जयभान सिंह को कैसे मनाएगी बीजेपी:-
अनूप मिश्रा ने पिछला विधानसभा चुनाव ग्वालियर की भितरवार सीट से लड़ा था लेकिन वह कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री लाखन सिंह यादव से चुनाव हार गए थे. वहीं जयभान सिंह पवैया ने ग्वालियर सीट से चुनाव लड़ा था और वह पूर्व मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर से चुनाव हार गए थे. लेकिन अब प्रद्युमन सिंह तोमर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं और उनके उपचुनाव लड़ने की पूरी संभावना है. ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिरकार पार्टी दो ध्रुव के इन नेताओं का मेल जमीन पर कैसे कराएगी? वहीं अनूप मिश्रा भी ग्वालियर चंबल के कद्दावर नेताओं में गिने जाते हैं. लिहाजा बीजेपी के लिए उन्हें साधना भी उपचुनाव के लिहाज से अहम है.
क्यों अहम है ग्वालियर चंबल:-
मध्य प्रदेश में आने वाले दिनों में 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है. इनमें से सबसे ज्यादा 16 सीटें ग्वालियर चंबल संभाग की ही हैं. इसी इलाके से सिंधिया समर्थक सबसे ज्यादा विधायक बीजेपी में शामिल हुए हैं. कई विधायक ऐसे भी हैं जिन्होंने बीजेपी के पूर्व मंत्रियों को विधानसभा चुनाव में शिकस्त दी थी. लिहाजा अब उनका बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना और हारे हुए नेताओं को साधे रखना बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है.