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Tuesday, May 19, 2020

पैर से टपकता रहा खून, पेट की भूख और घर वापसी की मजबूरी दौड़ाती रही

ग्वालियर। तीन दिन पहले बाइक ने टक्कर मार दी, पैर में घाव हो गया और खून बह निकला। मुश्किल से मेडिकल स्टोर मिला तो वहां से ड्रेसिंग बैंडेज और दर्द निवारक दवा ली। बैंडेज बांधकर टपकते खून के साथ ही घर की ओर निकल पड़ा। दो माह से काम-धाम बंद है और खाने के लाले पड़ गए हैं। ऐसे में मौत भी आए तो विदेश(दूसरे शहर) में कौन अपना है। वैसे तो जीवन ईश्वर के हाथ है, लेकिन जो होना है वह अपनों के बीच हो जाए तो कोई गम नहीं। यही सोचकर गांव के लोगों के साथ घर को निकला हूं। चोट के कारण असहनीय दर्द होता है, लेकिन वह पेट की भूख और अपनों से दूर होने से कम ही है। यह पीड़ा है बागपत उप्र निवासी संजय की। वह गांव के लोगों के साथ बैतूल में गुड़ बनाने का काम करते थे। लॉकडाउन के कारण वहीं फंसे थे। तीन दिन पहले ट्रैक्टर-ट्रॉली से 50 लोग निकले हैं। नईदुनिया टीम ने रविवार को सिकरौदा तिराहा, झांसी रोड हाइवे पर उनसे चर्चा की तो उनका दर्द जुबां पर आ आया।
एक टाइम मिल रहा खाना:-
एक ट्रॉली में 50 लोग सवार होकर निकले हैं। ट्रॉली में सामान भी भरा था। बैठने को जगह नहीं थी। सुरक्षित शारीरिक दूरी क्या है, इसकी वे परिभाषा जानना ही नहीं चाहते, क्योंकि मजबूर हैं। उन्हीं के गांव के इतने ही लोग दूसरी ट्रॉली में सवार थे। उन्हें रास्ते में एक टाइम का ही खाना मिला था। रविवार को सिकरौदा तिराहा पर जब सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें खाना दिया तो उन्हें काफी राहत मिली।
ठसाठस भरे वाहन में सांस लेने में परेशानी:-
सिकरौदा तिराहा पर सबसे ज्यादा लोग महाराष्ट्र से आकर उप्र व भिंड की ओर जा रहे थे। छोटा हाथी कहे जाने वाले वाहन में 35 लोग ठसाठस भरे थे। वे मुंबई से उत्तराखंड को निकले हैं। गाड़ी मालिक ने प्रत्येक से 7800 रुपए किराया लिया था। उन्हें 2200 किलोमीटर सफर करना है। रविवार को तीसरा दिन था। भरी दुपहरी में तपते वाहन में सांस लेना तक दूभर था, लेकिन घर लौटने की तड़प में वे सारी पीड़ा भूल चुके थे। यही हाल राजस्थान के शाजापुर से छतरपुर को निकले मजदूरों का था। वे भी छोटा हाथी में सवार थे। महिला, पुरुष के साथ नन्हे-मुन्नाों की संख्या 33 थी। गाड़ी चालक ने प्रत्येक मजदूर से 3 हजार रुपए किराया लिया था। इसके बावजूद हालत यह थी कि महिला लटकने को मजबूर थी, क्योंकि वाहन के आधे हिस्से में सामान भरा था।