सड़ांध मारता अल्पसंख्यकवाद और नकली सेक्युलरिस्ट.. संक्रमित वायरस की तरह भारत के जिहादी एकेडेमिक्स - TIMESNEWS

Breaking

TIMESNEWS

सच्चाई की कलम से

Thursday, April 23, 2020

सड़ांध मारता अल्पसंख्यकवाद और नकली सेक्युलरिस्ट.. संक्रमित वायरस की तरह भारत के जिहादी एकेडेमिक्स

(डॉ अजय खेमरिया)
शिवपुरी। कोरोना पर तबलीगियों और कुछ मुस्लिम की हरकतों पर आपत्ति से जुड़े  विमर्श को सांप्रदायिक बताया जा रहा है।दलील दीं जा रहीं है कि मुस्लिम वर्ग को बिना वजह निशाने पर लेकर हिन्दू एलिमेंट्स को खड़ा करने में संघ और बीजेपी के लोग लगे है। प्रलाप ये हो रहा है कि जो लोग संक्रमित जमाती के रूप में छिपे है उन्हें बेनकाब करने,डॉक्टरों की टीम पर हमला करने,थूकने,संक्रमण की मंशा से सब्जी, फल बेचने की हरकतों को बिना वजह तूल दिया जा रहा है।अपेक्षा की जा रही है कि इन सब मामलों पर चुप्पी ओढ़ ली जाए।कोई बात न की जाए क्योंकि इससे " गंगा जमुनी संस्कृति "को खतरा खड़ा हो रहा है।अब सवाल यह है कि क्या मौत के इस खतरनाक वायरस को देश के कुछ लोग अपने साम्प्रदायिक एजेंडे की तरह ले और उन्हें सिर्फ इसलिए कुछ न कहा जाए कि वे अल्पसंख्यक वर्ग से आते है।यह किस परिपक्वता का मापदंड है?वस्तुतः कोरोना संक्रमण ने भारत मे एक बार फिर 'अल्पसंख्यकवाद' के जहरीले वायरस को बेनकाब करने का काम किया है।2014 में मोदी के अभ्युदय ने इसके शमन की जो शुरुआत की है उसके नश्तर से घायल ये जिंदा आदमकद वायरस तड़फड़ा रहे है।
एक बड़ी ख्यातिनाम पत्रकार है सबा नकवी। दिल्ली की है और बड़े मीडिया घरानों में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं।फरमा रही है कि भारत मे मुसलमान दमन का शिकार हो रहे है वे अपने यूट्यूब वीडियो के जरिए बकायदा एक बिष कन्या की तरह जहर फैलाने में लगी है।उन्होंने भारत पर मुस्लिम अहसानों की लंबी फेहरिस्त भी प्रस्तुत की है।ताजमहल से लेकर जावेद अख्तर,मुनव्वर राणा, शाहरुख खान,आमिर खान,तक तमाम नाम गिना कर यह साबित करने की कोशिश की है कि भारत मुस्लिम जमात के अहसान तले दबा रहे।वे जिस लहजे में कोरोना को लेकर मोदी पर हमलावर है उससे उनकी बिषैली हताशा समझी जा सकती है।एक दूसरी पत्रकार है आरफा खानम।कभी सरकारी नोटों पर लोकसभा या राज्य सभा में अभिव्यक्ति का झंडा उठाये रखती थी।मुफ्तखोरी बन्द हुई तो अल्पसंख्यक की दुकान सजाकर बैठ गई।तीन तलाक और 370 पर इस तरह आग बबूला होने का स्वांग कर रही थी मानो जलकर अभी भस्म हुई जाती है।खुद लिपिस्टक लगाकर बाल छोटेकर हिजाब और बुर्का को सुपुर्देखाक कर बेपर्दा हो पत्रकारिता करतीं है लेकिन तकरीरें इस्लामिक आयतों की देती है।कोरोना को लेकर इन्हें भी बड़ी मरोड़ उठी है कह रही है जमातियों के जरिये मोदी सरकार जुल्म करना चाहती है।कभी आरिफ खान के जबाबों से दाएं बाएं भागने वाली ये खातून इन दिनों 'वायर' के जरिये  जिहाद का करंट फैला रही है।
सोचिए आरफा,सबा,मुनव्वर राणा और ऐसे ही तमाम लोगों को इस मुल्क ने क्या नही दिया है?अगर इन पढ़े लिखे मुस्लिमों की मानसिकता इस हद दर्जे तक जहरीली है तो उन ख़ातूनों का क्या दोष दिया जाए जो पर्दानशीं पैदा हुईं और वैसे ही सुपुर्दखाक कर दी जाती है।क्या शिकायत रखी जाए उन जमातीयों से जिन्हें तालीम के नाम पर सिर्फ देबबन्दी जिहादी होने का इल्म कराया गया हो।जो खुलेआम जिहाद को धर्मादेश मानकर हर गैर मुस्लिम को काफ़िर की तरह देखने,समझने और कत्ल कर खुदा को खुश करने को ही अपना पुरुषार्थ समझता है।
सच तो यह है कि भारत ने अपनी उदारमना जीवन शैली से अपने आँचल में सबको समेटा है।जिन मुगलिया इमारतों  और शख्सियतों का एहसान आज गिनाया जा रहा है वह मुस्लिम जीवन दृष्टि की कृपनता और कट्टर मजहबी मानसिकता को प्रमाणित करता है।विक्टिम कार्ड फेंकते हुए शाहरुख आमिर से अभिनय न करने की अपील की जा रहीं है क्योंकि वे मुस्लिम है।जावेद अख्तर से लेखन बन्द करने का आग्रह किया जा रहा है।ऐसे तमाम कुतर्क खड़े कर देश के पढे लिखे मुस्लिम तबके द्वारा जो प्रलाप किया जा रहे है वे मौलाना आजाद के उस जुमले को स्वयंसिद्ध कर रहा है जिसे कुछ समय पूर्व आरिफ मोहम्मद खान ने कोट (उद्धरत) किया था।
मौलाना आजाद कहा करते थे कि विभाजन के साथ जो सैलाब आया था वह अपने साथ तमाम गन्दगी बहा ले गया लेकिन गड्डो में जो पानी रह गया वो आज सड़ांध मार रहा है।ये सड़ांध मारता पानी आज इन सेक्युलरिस्ट जमात के रूप में जहर बन कर भारत के सामने खड़ा है।
,नसीरूद्दीन,आमिर,मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी,ओबैसी,आजम,सबा नकबी,आरफा खानम,जैसे थोकबंद पढ़े लिखे मुसलमान आज बेनकाब हो गए है।कल्पना कीजिये शाहरुख अगर भारत मे पैदा न हुए होते तो उनकी क्या गत हो रही होती?भारत ने उन्हें उनकी प्रतिभा के बदले क्या नही  दिया है।धन,वैभव,शोहरत,प्यार,सिर्फ इसलिए कि वह भारतीय कलाकार है। क्या उनकी इस शख्सियत में केवल मुसलमान बिरादरी का योग है।हालांकि शाहरुख खुद एक इंटरव्यू में खुद का धर्म भारतीय बता चुके है।फिर भी सेक्युलरिस्ट लोग उनके धर्म को बताकर अहसान गिनने के लिये कह रहे है।कमोबेश यही बात आमिर खान और दुसरे खान सरनेम वालों पर लागू होती है।जावेद अख्तर खुद को नास्तिक कहते है पर कोरोना या दिल्ली दंगो पर वे मुस्लिम रहनुमा बनकर सामने आ जाते है।मुस्लिम बुद्धिजीवी तंज कसकर उनसे लिरिक्स लिखने को मना कर रहे है क्योंकि वे मुसलमान है और भारत में मुसलमानों की कोई आवश्यकता नही।
सवाल यह है कि भारत के मुसलमान आखिर किस आदर्श के साथ खड़े है?अब्दुल कलाम और आरिफ खान जैसे स्कॉलर या सबा,राणा,अख्तर ,जैसे जहरीले जिहादियों के?सच तो यही है कि सेक्युलरिस्ट अपने आप में बौद्धिक जिहादी है वे भारत के सनातन मानबिन्दुओं के शत्रु है उन्हें इस शत्रुतापूर्ण प्रलाप और करतूतों की पूरी कीमत तबलीगी, वहाबी,स्रोतों से उपलब्ध होती है।पिछले 70 साल का इतिहास साक्षी है कैसे भारत के आक्रांताओं को अवचेतन के ऊपर स्थापित किया गया है।कोई यह नही बताता की जिस ताजमहल और दूसरी इमारतों को यह वर्ग अहसान बता रहा है उसे खड़ा करने वाले मुगलिया लुटेरों से इस भारत भूमि के लोगों का क्या रिश्ता है?क्या ताजमहल बनाने वाले मुगल अपने साथ मजदूर और धन लेकर आये थे?क्या लुटेरे मुगल अपने साथ औरतों का लश्कर लेकर आये थे जिनकी सन्तति होने का भृम आज भारत के मुसलमानों को कराया जाता है।मुगलों, तुर्को,अरबियों के साथ इस धरती का रिश्ता केवल लुटेरे और आतंकियों से ज्यादा कुछ नही है।तमाम मानव औऱ जीव विज्ञानी अनुसंधान स्पष्ट कर चुके है कि दक्षिण एशिया के सभी नागरिकों का डीएनए एक ही है और भारतीय मुसलमान मूल रूप से हिन्दू कन्वर्जन का नतीजा है।इसलिए मुसलमान वर्ग को हिंदुओ के दुश्मन के तौर पर स्थापित कर लुटेरी मुगलिया परम्परा के साथ जोड़ना किस मकसद से होता आ रहा है इसे आसानी से समझा जा सकता है।
 इस जिहादी मानसिकता को केवल कोरोना संकट ही नही बल्कि ताजा सीएए और दिल्ली दंगो के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की भी आवश्यकता है।शाहीन बाग और तब्लीगी जमात   एक प्रयोग ही है इसे आज किसी और ने नही खुद मुसलमानों के एक बड़े वर्ग और सेक्युलरिस्ट जमात ने साबित कर दिया है।पूरी दुनियां में तब्लीगीयों जैसा दुष्कर्म इस संकट में कोरोना वारयर्स के साथ नही हुआ है इसके बाबजूद अख्तर,सबा,राहत,और शाह जैसे बौद्धिक जिहादी चाहते है कि इस मामले पर धार्मिक पहचान के साथ बात न हो।जो नर्सों पर थूक रहें है,डॉक्टरों पर हमला कर रहें है,फलों और सब्जियों पर थूक लगाकर बेच रहे है वे उस प्रयोग को प्रमाणिक करते है जो गजवा ए हिंदुस्तान के सपने से जुड़ा है।जो यह सब दुष्कृत्य कर रहे है क्या वे वाकई इतने मासूम है?जितना दावा पढेलिखे मुस्लिम लोग करते आ रहे है।क्या यह तथ्य नही की भारत में कोरोना संक्रमण की आधी समस्या तब्लीगी जमातियों ने खड़ी की है।क्या कोरोना संक्रमण के जरिए जिहादी लक्ष्यों को पूरा करने में नही लगे है कुछ लोग?मौलाना साद की तकरीरें क्या कहती है?मुनव्वर राणा और जावेद अख्तर के बोल क्या कहते है?क्या ये शातिराना षडयंत्र नही की कोरोना को पहले छिपाया जाए फिर सरकार की एडवाइजरी को न माना जाए और अगर सरकार जमातियों को पकड़े तो उसके अफसरों पर कातिलाना हमले किये जायें।इससे भी बड़ा और घातक षड्यंत्र तो बुद्धिजीवी निर्मित कर चुके है क्योंकि वे इन हरकतों की आगे आकर निंदा नही करते है बल्कि अपने जिहादी कुतर्को से ऐसी तुलनायें खड़ी करते है जो किसी षडयंत्र से परे होकर लापरवाही को प्रमाणित करतीं है।अगर इस मुल्क के जिम्मेदार मुस्लिम लोग आगे आकर प्रधानमंत्री के आह्वान के साथ खड़े होते तो आज भारत कोरोना की जंग तो बेहतर और त्वरित तरीके से जीतता ही साथ ही करोड़ो मुसलमानों की इस धरती और संस्कृति के साथ प्रमाणिकता को भी स्वयंसिद्ध करता।हकीकत यह है कि आज भारत के आम मन में इन जिहादी लोगों ने पूरी कौम के प्रति एक अलगाव का माहौल खड़ा कर दिया है।इसके लिए एकमेव जबाबदेह ये नकली सेक्युलरिस्ट ही है जो अपनी कौम को शरीयत की अंधी सुरंग में धकेलना चाहते है और खुद आरफा की तरह प्रगतिशील बने रहना चाहते।इन असली जिहादियों को सलमान खान,आरिफ मोहम्मद खान,जैसे लोग फूटी आंख नही सुहाते है क्योंकि वे सच्चाई के साथ खड़े दिखते है।झूठ और अलगाव की दुकान चलाने वाले इन कारकुनों ने अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर मोदी से निजी शत्रुता भुनाने का जो काम किया है वह 70 साल में कोई नही कर सका है।कोरोना से जंग तो भारत जीत ही लेगा लेकिन गड्डों में शेष रहे गन्दे पानी की सफाई भी स्वयं ही इन सिरफिरे एकेडेमिक्स ने कर ली।इसके लिए इनका अंतिम अभिवादन तो बनता ही है।
साभार,,,,डॉ अजय खेमरिया