"साहेब !! कोरोना नहीं भूख ड़ायन खायत जात है!!" 12 साल की मासूम की भूख से मार्मिक मौत - TIMESNEWS

Breaking

TIMESNEWS

सच्चाई की कलम से

Thursday, April 23, 2020

"साहेब !! कोरोना नहीं भूख ड़ायन खायत जात है!!" 12 साल की मासूम की भूख से मार्मिक मौत

बीजापुर, छत्तीसगढ़। अपना घर अपना गांव हर किसी के लिए अभावों के बीच की किसी जन्नत से कम नहीं होता..और जब चारों तरफ से रास्ते बंद कर दिए गए हो.. जीवन थमा दिया गया हो.. जो जहां है उसे वही रोक दिया गया हो.. चाहे फिर यह परिस्थिति के कोख से जन्में हालात करा रहे हो.. या फिर मौत के डर का साया ऐसा करने पर बाध्य कर रहा हो.. कारण चाहे जो भी हो लेकिन जब पापी पेट का सवाल.. छोटी सी उम्र में आपको..जिम्मेदारियों के बोझ तले.. बड़प्पन का आवरण ओढ़ने पर मजबूर कर दे..और पेट की आग जब अपने गांव अपने घर से नहीं बुझ पाए.. तो फिर कारवां..ग़ुबार और बयार के साथ बहते जाना ही शायद नियति बन जाती है। 
ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ के बीजापुर के आदेड़ गांव की 12 साल की उस बच्ची जमलो मड़कम के साथ भी था। जिसके घर में चूल्हा.. हांडी.. बर्तन.. भांडे.. और  गरीबी की दास्तां कहता..थोड़ा सा गृहस्थी का सामान..लंबे अरसे से.. अपने खालीपन को भरने की.. बाट जोह रहा था..लेकिन जब यह खालीपन जमलो मड़कम के परिवार के लिए.. रोज की बात हो गई तो फिर.. उसने एक दिन.. छोटी सी उम्र में ही..अपने ही गांव के एक मजदूरों की टोली के साथ तेलंगाना के पेरूर की तरफ रुख कर दिया। जब महामारी का दंश देश की चारों दिशाओं में फैलने लगा तो..जो जहां है..उसे वहां थमने पर.. शासन प्रशासन और कानून व्यवस्था ने बाध्य कर दिया। 12 साल की बच्ची जमलो मड़कम भी.. इसी बाध्यता का.. शिकार हुई और तेलंगाना के पेरूर गांव में ही उसे थमना पड़ गया।  जब पापी पेट के गोले में..सूखी रोटी के टुकड़े भी वहां मयस्सर ना हुए.. तो उसने अपने गांव लौटने का इरादा किया गांव जाने की खुशी..कोई साधन नहीं.. अपने नन्हें पैरों से लगातार भूखे पेट.. यह बच्ची गांव के दीगर लोगों के साथ लौट रही थी और 100 किलोमीटर की यात्रा भी.. पूरी कर ली थी.. कि महज अपने घर से.. 14 किलोमीटर दूर रहते..भूख के साथ जान का सौदा.. नियति ने कर दिया। जमलो मड़कम की भूख प्यास ने अदद रोटी की अधूरी कहानी पर मौत के हस्ताक्षर कर दिये..रोटी की आस लिए.. भूख एकबार फिर.. जीवन से जंग हार गई..रोटी की तलाश में.. शुरू हुई जमलो की दास्तां.. रोटी के अभाव में अपना उपसंहार लिख गई।

जिस रोटी की तलाश में..वह अपने घर से गई थी.. उसी रोटी के खातिर वह.. अपने घर वापस आ रही थी.. तो रोटी के इस सफर में आखिर पेट के गोले में..उमड़ने वाली असहनीय आग ने..इस गरीब बालिका को..जीवन से हरा दिया.. जमलो का कोरोना ने तो कुछ ना बिगाड़ा.. पर कलमुंहे कोरोना से पैदा हुई..बेरोज़गारी और बेगारी ने..उसी रोटी का अकाल खड़ा कर ड़ाला.. जिसने उसे पराए सूबे तक ला पहुंचाया..
क्या जमलो की दास्तां हमारे देश के विकासशील मॉडल पर भूख से तड़पता हुआ एक करारा तमाचा नहीं है..!! क्या जमलो ..सरकार की सरोकार से जुड़ी उन योजनाओं के सच का आईना नहीं है..जिन्हें सरकार टीवी के..बिकाऊ होने को आतुर पर्दे पर..खबरों की चाशनी में लपेट परस कराने में माहिर है..क्या..!! आज भी 70 साल से ज्यादा बूढ़े भारत में..रोटी और भूख के सवाल.. अपने हाल खोजते -खोजते काल के गाल में..समाते हुए हमारी प्रगति को मुंह नहीं चिढ़ा रहे हैं..सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी.. संवेदना से पैदा होती..वेदना को भेदते हुए..दास्तान-ए-हिंदुस्तान बनने की क्षमता रखती हैं... यकीनन !! बेशक !! ये बेबाक सच हैं.... लेकिन यक्ष प्रश्न बस !!! एक जागो तो एक बार सरकार जागो तो....!!!!!
अंत में अफ़सोस कि हम अपने घर की उस इकलौती जीवट बालिका जमला की भूख को ज़िंदा रहने लायक निवाला भी ना दें सकें क्योंकि ग़रीबी से बड़ा कोई गुनाह नहीं होता..!!!!!!!
(टी.एन.मनीष)